एनईपी आधारित अध्यादेश लागू करने वाला एमडीएसयू प्रदेश का पहला विश्वविद्यालय
अजमेर। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए मंगलवार को विश्वविद्यालय के स्वराज सभागार में एक दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट वर्कशॉप का आयोजन किया। कार्यशाला में उप मुख्यमंत्री डॉ. प्रेमचंद बैरवा बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहे।
विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यशाला में अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (एबीआरएसएम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. नारायण लाल गुप्ता, संगठन मंत्री महेंद्र कपूर, कुलसचिव कैलाश चंद्र शर्मा सहित बोर्ड ऑफ स्टडीज के सदस्य, संकाय सदस्य एवं शोधार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। यह कार्यशाला पाठ्यक्रम निर्माण, अध्यादेश क्रियान्वयन तथा एनईपी की मूल भावना को संकाय सदस्यों तक संप्रेषित करने के उद्देश्य से आयोजित की गई।
मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए राज्य के उप मुख्यमंत्री डॉ. प्रेमचंद बैरवा ने कार्यशाला के आयोजन की प्रशंसा करते हुए कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय ने इस फैकल्टी डेवलपमेंट वर्कशॉप के माध्यम से प्रदेश के शिक्षा जगत में एक नई मिसाल कायम की है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि एमडीएसयू राजस्थान का पहला विश्वविद्यालय है जिसने एनईपी 2020 के अनुरूप अध्यादेशों का निर्माण कर उन्हें संस्थागत स्वरूप प्रदान किया है।
डॉ. बैरवा ने कहा कि शिक्षक राष्ट्र के निर्माता और ज्ञान के प्रकाश स्तंभ होते हैं। एक शिक्षक केवल किताबी ज्ञान नहीं देता, बल्कि चरित्र निर्माण, सही दिशा का मार्गदर्शन और आत्मनिर्भरता भी सिखाता है। सरकार केवल नीतियां बना सकती है, किंतु उन्हें लागू शिक्षकों द्वारा ही किया जा सकता है।
राजस्थान सरकार की उच्च शिक्षा संबंधी उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि प्रदेश के सभी राजकीय महाविद्यालयों में च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम एवं सेमेस्टर सिस्टम लागू कर दिया गया है। उच्च शिक्षा को कौशल आधारित एवं व्यावहारिक बनाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। लघु, सीमांत, बटाईदार किसानों एवं खेतीहर श्रमिकों के बच्चों के लिए सत्र 2024-25 से शुल्क माफी की व्यवस्था की गई है। छात्राओं के लिए 30% क्षैतिज आरक्षण तथा ब्लैक बेल्ट योग्य छात्राओं को 5% बोनस अंक का प्रावधान। 71 नवीन राजकीय महाविद्यालयों की स्थापना जिनमें 36 सामान्य शिक्षा, 25 कन्या एवं 9 कृषि महाविद्यालय सम्मिलित हैं। एआई, रोबोटिक्स एवं 3D प्रिंटिंग जैसे भविष्योन्मुखी पाठ्यक्रम प्रमुख तकनीकी संस्थानों में शुरू किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य स्पष्ट है – केवल डिग्री नहीं, दक्षता भी दें; नौकरियां भी दें और नवाचार भी दें। राजस्थान के युवा देश के स्टार्टअप इको-सिस्टम में न केवल प्रतिभागी बनें, बल्कि लीडर और रोजगार देने वाले भी बनें।उन्होंने महर्षि दयानंद सरस्वती की महान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस विश्वविद्यालय ने उस परंपरा को जीवंत रखते हुए एनईपी के क्रियान्वयन में अग्रणी भूमिका का निर्वहन कर रहा है। उन्होंने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए सभी शिक्षकों से मिलकर काम करने का आह्वान किया।
कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन के संदर्भ में राज्य सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि NEP एक व्यापक एवं गतिशील दस्तावेज है, जिसका सफल कार्यान्वयन केवल विश्वविद्यालय स्तर पर नहीं, बल्कि सरकार एवं विश्वविद्यालयों के समन्वित प्रयास से ही संभव है।
उन्होंने प्रवेश प्रणाली में लचीलापन (Flexibility) सुनिश्चित करने हेतु राज्य सरकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता बताई। NEP के अनुसार, विभिन्न विषयों के विद्यार्थियों को अन्य स्ट्रीम में प्रवेश का अवसर मिलना चाहिए, जिसके लिए या तो राज्य विश्वविद्यालयों को CUET में सम्मिलित किया जाए या राज्य स्तर पर एक समान प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाए।
उन्होंने कहा कि सामान्य शैक्षणिक ढांचा (Common Academic Framework) एवं एकरूप शैक्षणिक कैलेंडर (Uniform Academic Calendar) का निर्माण आज सबसे बड़ी आवश्यकता है। इससे विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के बीच समन्वय स्थापित होगा तथा मल्टीपल एंट्री-एग्जिट एवं क्रेडिट ट्रांसफर प्रणाली प्रभावी हो सकेगी।
उन्होंने रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग (RPL), एक्सटेंडेड (Extended) एवं एक्सेलेरेटेड (Accelerated) सेमेस्टर तथा सेमेस्टर प्रणाली के स्पष्ट क्रियान्वयन हेतु सरकार द्वारा मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOPs) तैयार करना आवश्यक बताया ताकि दुरुपयोग रोका जा सके और एकरूपता बनी रहे। साथ ही क्लस्टर ऑफ कॉलेजेस मॉडल को अपनाने का सुझाव दिया, जिससे संसाधनों की कमी वाले महाविद्यालय भी मल्टीडिसिप्लिनरी शिक्षा, स्किल एवं वैल्यू एडेड कोर्सेस संचालित कर सकें।
प्रो अग्रवाल ने फैकल्टी प्रशिक्षण (Faculty Training) को सुदृढ़ करने के लिए MMTTC जैसे संस्थानों के माध्यम से व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने की आवश्यकता बताई, ताकि शिक्षक NEP की मूल भावना को समझकर उसे लागू कर सकें साथ ही इंडस्ट्री-एकेडमिक सहयोग एवं इंटर्नशिप व्यवस्था के लिए स्पष्ट SOPs एवं नियमन आवश्यक हैं, जिससे प्रमाणपत्रों के दुरुपयोग को रोका जा सके।
कुलगुरु ने ऑर्डिनेंस एवं नीतिगत स्पष्टता पर बल देते हुए कहा कि सरकार को सभी विश्वविद्यालयों के लिए समान नियम एवं दिशा-निर्देश तैयार करने चाहिए, विशेषकर हॉरिजॉन्टल एवं वर्टिकल मोबिलिटी के संदर्भ में। अंत में कुलगुरु ने यह स्पष्ट किया कि NEP 2020 की सफलता का प्रमुख आधार मानव संसाधन की मानसिकता एवं प्रतिबद्धता है। अतः सरकार को नीतिगत समर्थन के साथ-साथ एक सक्षम, समन्वित एवं व्यावहारिक ढांचा तैयार करना होगा, जिससे नीति का क्रियान्वयन प्रभावी रूप से सुनिश्चित हो सके।
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए एबीआरएसएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. नारायण लाल गुप्ता ने देश भर में 200 से अधिक कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में एनईपी के क्रियान्वयन की जमीनी फीडबैक के आधार पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि एनईपी 2020 एक स्टैटिक डॉक्यूमेंट नहीं, बल्कि एक डायनेमिक दस्तावेज है जो आगामी 20-25 वर्षों की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। यह एक मैराथन है, स्प्रिंट नहीं—इसलिए चरणबद्ध ब्लूप्रिंट बनाकर ही आगे बढ़ना होगा।
उन्होने इस बात पर जोर दिया कि विभिन्न संस्थानों—केंद्रीय, राज्य विश्वविद्यालयों और छोटे महाविद्यालयों की संसाधन क्षमता और परिस्थितियां अलग-अलग हैं, इसलिए NEP का एकसमान (uniform) क्रियान्वयन संभव नहीं है। इसके लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार चरणबद्ध (phased) ब्लूप्रिंट आवश्यक है। इंटर्नशिप, मल्टीडिसिप्लिनरी शिक्षा और क्रेडिट सिस्टम जैसे प्रावधानों के व्यावहारिक क्रियान्वयन में कई समस्याएं सामने आ रही हैं, जैसे संसाधनों की कमी, अवसरों का अभाव और वित्तीय प्रभाव।
उन्होने राज्य स्तर पर एक समान क्रेडिट संरचना (uniform credit structure) और एक समान शैक्षणिक कैलेंडर (uniform academic calendar) लागू करने की आवश्यकता बताई, ताकि मल्टीपल एंट्री-एग्जिट और क्रेडिट ट्रांसफर सुचारु रूप से संभव हो सके। साथ ही विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक स्वायत्तता (academic autonomy) बनाए रखने पर भी बल दिया गया।
कार्यशाला संयोजक प्रो आशीष भटनागर ने बताया कि कार्यशाला में उद्घाटन सत्र के पश्चात पांच तकनीकी सत्र आयोजित किए गए जिनमें प्रत्येक सत्र में 30 मिनट की प्रस्तुति एवं 15 मिनट की परिचर्चा का प्रावधान था। इन सत्रों में क्रमशः 3+2 अध्ययन पद्धति, SWAYAM पोर्टल का समाहन, पांच वर्षीय इंटीग्रेटेड यूजी-पीजी कार्यक्रम, चार+एक वर्षीय ऑनर्स कार्यक्रम तथा विश्वविद्यालय के नवनिर्मित अध्यादेशों की रूपरेखा एवं संशोधन प्रस्तावों पर विस्तृत विचार-विमर्श हुआ।
कार्यशाला की भूमिका प्रस्तुत करते हुए प्रो भटनागर ने कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय का यह प्रयास भारतीय उच्च शिक्षा के व्यापक संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे समय में जब देश अपनी 40 करोड़ युवा जनसंख्या (15-29 वर्ष आयु वर्ग) को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर रहा है, एमडीएसयू की यह पहल शिक्षा को वास्तविक जीवन और रोजगार से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में जहां हर पांच से दस वर्ष में रोजगार का स्वरूप बदलता है, विश्वविद्यालय का यह प्रयास विद्यार्थियों को अपनी क्षमता, अभिरुचि एवं रचनात्मकता के अनुसार अध्ययन-पथ चुनने की स्वतंत्रता देता है। यह न केवल व्यक्तिगत विकास, बल्कि समाज एवं राष्ट्र के सर्वांगीण उत्थान की दिशा में एक सुदृढ़ कदम है।
महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर एनईपी 2020 के क्रियान्वयन में राजस्थान का अग्रदूत बनकर उभरा है और देश के अन्य विश्वविद्यालयों के लिए एक प्रेरणादायक रोल मॉडल प्रस्तुत कर रहा है। विभिन्न सतराओन मेन राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विभिन्न पार्ट पर जानकारी अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो सुभाष चन्द्र, सोफिया स्वायत्तशासी महाविद्यालय की प्राचार्य सिस्टर पर्ल, प्रो अरविंद परीक एवं प्रो मोनिका भटनागर द्वारा दी गई।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुब्रतो दत्ता, प्रोफेसर ऋतु माथुर, प्रोफेसर शिव प्रसाद, वित्त नियंत्रक नेहा शर्मा, परीक्षा नियंत्रक डॉ सुनील टेलर सहित विभिन्न महाविद्यालय के प्राचार्य, संकाय सदस्य, बोर्ड ऑफ स्टडीज के सदस्यों एवं अधिकारियों ने सक्रिय भागीदारी करते हुए पाठ्यक्रम निर्माण हेतु अपने सुझाव एवं संशोधन प्रस्तुत किए। आभार ज्ञापन कुलसचिव कैलाश चन्द्र शर्मा ने किया।



