पंचशील नगर में विराट हिन्दू सम्मेलन
अजमेर। सर्व हिन्दू समाज की ओर से सनातन संस्कृति, सनातन धर्म एवं सामाजिक एकता के प्रतीक विराट हिन्दू सम्मेलन के पंचशील नगर में दो दिवसीय आयोजन का रविवार को लक्ष्य पैलेस में संत समागम के साथ समापन हुआ। इससे पहले कलश यात्रा व संदेश यात्रा निकाली गई। विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों में बडी संख्या में धर्मप्रेमियों ने शिरकत की। राष्ट्र संत कृष्णानंद महाराज का सान्निध्य मिला।
वैदिक सनातन परंपरा को जागृत करने का समय
मुख्य अतिथि लाडली घर के संस्थापक राष्ट्र संत कृष्णानंद महाराज ने आशीर्वचन देते हुए कहा कि एक समय था जब सनातन और हिन्दुत्व का राज समूचे विश्व में फैला हुआ था, धीरे धीरे यह सिर्फ भारत तक सीमित होकर रह गया। यानी हम सोते रहे और अंधियारा घिरता गया। हालत यह हुई कि आज हिन्दू को जगाने की जरूरत आन पडी। हमें अपनी निद्रा तोडनी होगी। क्योंकि छल-कपट से सनातन को तोडने वाली शक्तियां एक होकर हमें मिटाने में जुटी हुई हैं। हम जात-पांत में बंटते गए और कमजोर होते गए। सनातन का वैभव सीमित हो गया। वैदिक सनातन परंपरा को जागृत करने और जगने का समय आ गया है। यह जाति पूछने का नहीं बल्कि आत्ममंथन का समय है। भेदभाव को तिलांजलि देनी होगी। सबको गले लगाना होगा। एक होकर धार्मिक आयोजन में सहभागी बनें। उन्होंने कहा कि संगठन में शक्ति है चाहे परिवार हो, समाज हो अथवा राष्ट्र हो। बंटें नहीं बल्कि सब मिलकर राष्ट्र निर्माण में जुटें।
वसुधैव कुटुम्बकम की भावना हमारा मूलभूत सिद्धांत
इंजीनियरिंग कालेज में प्रबंधन विषय के विभागाध्यक्ष एवं भारतीय शिक्षण मंडल चितौड प्रांत मंत्री विशिष्ट अतिथि राधाकिशन मोटवानी ने कहा कि यह आत्मचिंतन और राष्ट्र जागरण का समय है। जात पात, वेशभूषा, भाषा को लांघकर हम सदैव एक रहे हैं। इसमें संत महापुरुषों का अहम योगदान रहा। हमारे यहां युगों युगों से संत परंपरा रही है। हमने हमारी सभ्यता और संस्कृति को सीमित नहीं रखा। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना हमारा मूलभूत सिद्धांत रहा। उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यता रही है कि 84 लाख योनियो की तपस्या पूर्ण होने के बाद मनुष्य जन्म मिलता है। हमारा जन्म इस पुण्य धरा पर हुआ, इसका हमें गर्व होना चाहिए। यह भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण और शिवाजी महाराज जैसे वीरों की कर्मभूमि रही है। हमारा भी तन मन मातृभूमि के लिए सदैव प्रकट रहे। वर्तमान समय में हमारी सामाजिक समरसा को असुरी शक्तियां तोडने के प्रयास में जुटी हैं। इन्हें सफल नहीं होने देना हैं। हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति के मूल भाव को बनाए रखना है। सकल हिन्दू समाज अपने रीति रिवाजों, भाषा, भोजन पर गर्व की अनुभूति करें। क्योंकि जैसा व्यक्ति का स्वाभाव होता है ठीक वैसा ही राष्ट्र का स्वभाव बनता है।
जाति पूछना छोड दें, हिन्दू संगठित हो जाएगा
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ अधिकारी ज्योत्सना रंगा ने कहा कि हम सनातनी हैं यानी हमारे बीच कोई अंतर नहीं। परस्पर जाति पूछना छोड दें। इतना सा प्रयास हिन्दू को संगठित करने के लिए काफी है। हमारी पहचान जाति से नहीं बल्कि हिन्दू से हो। उन्होंने कुटुम्ब प्रबोधन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि एक दौर ऐसा था था जब नाना-नानी, दादा-दादी, मामा-मामी, मौसी-मौसा जैसे अनेकानेक रिश्ते बच्चों को विरासत में मिलते थे। अब इन रिश्तों में बहुत से विलुप्त होते जा रहे हैं। सीमित परिवार की धारणा इसके लिए जिम्मेदार है। अब परिवार माता-पिता और एक बच्चा तक सीमित होते जा रहे हैं। ऐसे में नई पीढी का जीवन एकाकी होता जा रहा है। अपने बच्चे को रिश्ते देना माता-पिता का काम है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में एक बार फिर संयुक्त परिवार की धारणा बलवती हो रही है। नौकरी व अन्य कारणों से परिवार का साथ रहना संभव ना हो तो संवाद और संपर्क बनाए रखना परिवार को एकसूत्र में बांधे रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा और संस्कार अलग अलग है। स्कूलों में सिर्फ शिक्षा मिलती है लेकिन संस्कार घर में मिलते हैं। इसमें माता व बहनों की भूमिका अधिक होती है।
कलश यात्रा का जगह-जगह भव्य स्वागत
हिन्दू सम्मेलन से पूर्व दिन में निकाली गई कलश यात्रा व संदेश यात्रा का जगह जगह पुष्पवर्षा केे जरिए धर्मप्रेमियों ने भव्य स्वागत किया। कलश यात्रा पंचमहेश्ववर महादेव मंदिर सेक्टर 2 उद्यान से आरंभ हुई जो राजीव गांधी सर्किल, बी ब्लॉक होते हुए पंचशील के विभिन्न मार्गों से गुजरी। कलश यात्रा के साथ ही सनातन के नारे लिखे तख्तियां थामे अनेकानेक लोग साथ चले। मनकामेश्वर मंदिर और शिव शक्ति मंदिर के समीप राष्ट्रसेविका समिति की स्वयंसेविकाओं ने आत्मरक्षा का प्रदर्शन किया। घोडे पर सवार तलवार थामे मातृशक्ति को देख तालियों से स्वागत किया। मुख्य कार्यक्रम स्थल विजय सरिता के पास लक्ष्य पैलेस पर कलशयात्रा सम्पन्न हुई। संत समागम के पश्चात समस्त धर्मप्रेमियों ने सामाजिक समरसता से परिपूर्ण भोजन प्रसादी ग्रहण की।



