राजनीति में इनकी भी जय-जय, उनकी भी जय-जय

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सिरोही। भाजपा मे अन्य पिछ्डा वर्ग कि राजनीति मनुवादी सोच के  छुटभैयों को नागवार गुजरी और वे पार्टी से दोगलाई पर उतर आए । इनके दोगलेपन की स्थिति यह है कि यह पीठ पीछे एक होकर इन्हें काटने की साजिशें करते हैं और सामने आने पर चरण स्पर्श करके थूककर चाटने से भी बाज नहीं आते। वैसे स्थानीय सांसद और विधायक इनकी भीतरघात और दोगले व्यवहार से वाकिफ हो गये है और इन्हे हाशिये पर भी डाल दिया है, लेकिन जरूरत इनकी तुच्छ राजनीति पर विराम लगाने की है।

विधानसभा, लोकसभा और नगर परिषद चुनावों में कथित ओबीसी पाॅलिटिक्स का अंत करने के लिए कांग्रेस के नेताओ के हाथ से हाथ मिलाकर काम करने वाले भाजपा में शामिल दोगले छुटभैये लोकसभा, विधानसभा चुनावों की तरह ही नगर परिषद चुनाव में भी विजेता के साथ आकर खडे हो गए। जबकि एक दिन पहले तक यह इसी ओबीसी नेता की काट करते हुए विरोधी खेमे में आते-जाते देखे गए।

नगर परिषद सिरोही के चुनावों में भाजपा पर्यवेक्षक के सामने पार्टी पदाधिकारियों और जिला परिषद के वार्ड संख्या-20 के चुनावों के दौरान अपने ही नेताओं की गुप्त मीटिंग में उतरे हुए चेहरों की फोटो मीडिया में सार्वजनिक करने वाले यह कथित छुटभैये नेता ताराराम माली के सभापति बनने के बाद उनके सबसे करीबी दिखने का नाटक इस तरह करते नजर आए जैसे कि यह उनके सबसे बडे हितैषी हैं, दरअसल इस चापलूसी का मूल कारण इन कथित छुटभैयों को युवा मोर्चा में महत्वपूर्ण पद में काबिज होने की कवायद मात्र है।

आखिर हो क्यों नहीं इनका राजनीतिक भविष्य उन्हीं सरल और सहज ओबीसी नेताओं की मेहरबानी की मोहताज हो चुका है,  जिनकी राजनीति को यह पीठ पीछे खतम करने की सौगंध खाते रहते हैं और गाहे बगाहे मौका मिलने पर सरल नेताओं की पीठ में छुरा भोंकने से भी नहीं चूके हैं।
इतना ही नहीं वार्ड संख्या आठ, नौ, दस  और पंद्रह में भाजपा की शिकस्त में इनकी भीतरघात का महत्वपूर्ण रोल रहा वहीं अपने प्रत्याशी को सभापति पद का दावेदार बनाने के लिए ग्यारह में भाजपा का हराने की इनकी तमाम कोशिशें इसलिए नाकाम हो गई कि खुद दावेदार इनकी साजिशों से वाकिफ थे।

जातिगत संतुलन बैठाने के लिए सभी जातियों को साथ लेकर चलना जरूरी है, लेकिन इस तरह की विध्वंसक गतिविधियों से पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे आत्मघाती दस्तों को पार्टी से दूर रखना ही उचित भी है और दूरदर्शिता पूर्ण भी। अपितू ऐसे छुटभैयों की करीबी से कर्मठ पार्टी से दूर होते जा रहे हैं।
वैसे इस बार भी ये छुटभैये पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों को नुकसान पहुंचाने के लिए दो दिन पहले भी भाजपा खेमे में घुसे थे, लेकिन सांसद देवजी पटेल, विधायक ओटाराम देवासी, भाजपा जिलाध्यक्ष लुम्बाराम चैधरी व भाजपा नगर अध्यक्ष बाबूलाल सगरवंशी की सधी हुई रणनीति के आगे इनकी साजिशें फेल होती नजर आई और अंत में 25 नवम्बर को समर्पण करना ही इनकी मजबूरी बन गया। वैसे भाजपा के पार्षदों के खेमे में पहुंचकर इन लोगों की मूल भावना जिला परिषद चुनावों की तरह पार्षदों को तोडना ही था, लेकिन इनकी नीयत भांपते हुए पार्टी पदाधिकारियों ने पूरी सतर्कता बरती और इन्हें नाकाम किया।

सबगुरू न्यूज को पार्टी मे ही इनकी दोगले रवैये से परेशान कर्मठ कार्यकर्ताओ ने लोगों की आॅडियो रिकाॅर्डिंगे भी उप्लब्ध करवाई है, जिनमें ये छुटभैये लोकसभा, विधानसभा व नगर परिषद चुनावों से पहले पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होते हुए अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ साजिशें करते भी सुनाई दियेे।
जिस तरह का प्रचण्ड बहुमत नगर परिषद में भाजपा को मिला है, उससे ऐसे छुटभैयों को दरकिनार करना ही भीरतघातियों के गाल पर सबसे बडा तमाचा होगा, पार्टी के नेताओं के पास इन्हीं की जातियों के बेहतर और वफादार विकल्प उपलब्ध हैं, जरूरत है इस बार उन्हें स्थान देकर दोगले नेताओं को  दूसरे पायदान पर रखने की। क्योंकि इनकी न तो पार्टी को जरूरत है और न ही मतदाताओं को। यदि अभी से ही इनके पर कुतरने शुरू नहीं किए गए तो यह पांच साल बाद फिर पार्टी के प्रत्याशियों की कब्र खोदने के लिए विपक्ष से हाथ मिला सकते हैं। वैसे जिले के भाजपा नेताओं के लिए यह बडी उपलब्धि है कि पीठ पीछे कुआं खोदने वाले ये छुटभैये सार्वजनिक स्थानों पर इनके चरण स्पर्श करते नजर आते हैं, जो इनकी वास्तविक जगह है।