
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ कश्मीरी विद्यार्थियों की पिटाई, 6 घायल
चित्तौड़गढ़। राजस्थान के मेवाड़ विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले कश्मीरी विद्यार्थियों के साथ चित्तौड़गढ़ जिले में कुछ स्थानीय लोगों ने मारपीट की, जिसमें छह कश्मीरी विद्यार्थी घायल हो गए। एक कश्मीरी विद्यार्थी ने गुरुवार को यह जानकारी दी।
हरियाणा में मालगाड़ी के 15 डिब्बे पटरी से उतरकर नदी में गिरे

चंडीगढ़। हरियाणा के अंबाला जिले के पास गुरुवार को एक मालगाड़ी के कोयले से लदे 15 डिब्बे पटरी से उतर गए और मारकंडा नदी में गिर गए। रेलवे के अधिकारियों ने यह जानकारी दी। बताया जा रहा है कि रेलगाड़ी का चालक और गार्ड सुरक्षित हैं।
कॉन्फिडेंस लूज नहीं, बल्कि तय करें लक्ष्य
पढ़ाई पूरी होते ही करियर के पहले स्टेप, रिज्यूम भेजने कि तैयारी शुरु हो जाती है। ऐसे में पहला प्रश्न यही होता है कि जॉब के लिए किस कंपनी या सेक्टर को चूज करें। जबकि कई बार हम सेक्टर चूज भी कर लेने पर, सैलरी पैकेज कम होने का पता चलता है तो, हमारा कॉन्फिडेंस लूज हो जाता है। हम दूसरी फील्ड में स्पेस तलाशने लगते हैं।
सबरीमाला मंदिर मामले में एक नया मोड़, महिलाओं के प्रवेश की वकालत

नई दिल्ली: सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी के मामले में एक नया मोड़ आया है। पहली बार हिन्दू धर्म के दो धार्मिक संस्थानों के प्रमुख ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की वकालत की है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई इंटरवेंशन याचिका में स्वामी भूमा नंद तीर्थ व्यास तपोवा नारायण आश्रम तपोवनम, त्रिसूर और स्वामी स्वामी भूमा नंद तीर्थ वेन्जिन्सरी ने कहा है कि 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी, प्रथा के आधार पर तो हो सकती है लेकिन यह शास्त्र और संविधान सम्मत नहीं है।
प्रथा विनाशकारी भी हो सकती है
याचिका में कहा गया है कि प्रथा का स्थान धर्म शास्त्र के काफ़ी नीचे है। वह अपनी बात वैदिक साहित्य के आधार पर कह रहे हैं जोकि महिलाओं के समान अधिकार की बात करते हैं और बिना किसी भेदभाव के उन्हें मंदिरो में प्रवेश के योग्य बनाते है। इन दोनों संस्थानों ने अपनी अर्जी में कहा है कि मंदिर में प्रथा और विश्वास के आधार पर महिलाओं के प्रवेश पर रोक नहीं लगाई जा सकती। कोई भी प्रथा, अच्छी, महान हो सकती है लेकिन विनाशकारी भी हो सकती है जैसा इस मामले में महिलाओं के धार्मिक अधिकारों के साथ हो रहा है।
इसके अलावा याचिका में कहा गया कि कोई भी प्रथा या रिवाज धर्म और आस्था पर आधारित हो सकता है लेकिन वह इसे विश्वासपूर्ण नहीं बनाते। संविधान सर्वोच्च है और सारे मंदिर इसके बनाए कानून के तहत आते हैं इसलिए महिलाओं को पूजा के अधिकार से वंचित नहीं रखा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा है कि सबरीमाला मंदिर बनाने वालों का स्पष्ट मत था कि मंदिर के सामने बनी 18 सीढ़ियां भगवन अयप्पा के सामने आती है। इन सीढ़ियों पर वही लोग चढ़ सकते है जिन्होंने पारंपरिक व्रत किया हो बाक़ी लोग बगल की सीढ़ियों से मंदिर में जाते है। इस सीढ़ियों से महिलाएं पहले भी गई है और अब भी जा सकती हैं। मामले की अगली सुनवाई 22 अप्रैल को होगी।