अजमेर नगर निगम चुनाव 2026: वार्ड 52 में बागियों ने बिगाड़ा भाजपा-कांग्रेस का गणित

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बीना टांक और सीमा गोस्वामी के मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोणीय से बहुकोणीय, बूथ मैनेजमेंट बनेगा निर्णायक

अजमेर। नगर निगम चुनाव 2026 में वार्ड 52 इस बार उन सीटों में शामिल हो गया है, जहां भाजपा और कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से ज्यादा अपने ही खेमे से उठ खड़ी हुई है। करीब 5,692 मतदाताओं वाले इस वार्ड में कुल 12 प्रत्याशी मैदान में हैं। भाजपा से सुन्दर सिंह टांक और कांग्रेस से सतीश बैरवा अधिकृत उम्मीदवार हैं, लेकिन दोनों दलों से बगावत कर मैदान में उतरीं बीना टांक और सीमा गोस्वामी ने चुनावी मुकाबले को खासा पेचीदा बना दिया है।

मैदान में आम आदमी पार्टी के मनीष टॉक, बसपा के जगदीश तथा निर्दलीय दिनेश चौहान, गोविन्द, हेमन्त, जीतेन्द्र राठी, कपिल आसोपा और सुनील भी हैं। चुनाव प्रचार थमने के बाद अब प्रत्याशी मतदाताओं से अंतिम संपर्क और बूथ स्तर पर अपने समर्थकों को सक्रिय करने में जुटे हैं।

दो बागी महिला प्रत्याशी बनीं सबसे बड़ी चुनौती

वार्ड 52 की सबसे खास बात यह है कि यहां दोनों प्रमुख दलों के सामने उनकी ही पार्टी से निकला असंतोष चुनौती बनकर खड़ा है। कांग्रेस की बागी बीना टांक और भाजपा की बागी सीमा गोस्वामी के मैदान में होने से पार्टी के पारंपरिक वोटों के विभाजन की संभावना ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।

सीमा गोस्वामी को स्थानीय राजनीतिक हलकों में विधायक अनिता भदेल के करीबी नेताओं में माना जाता रहा है। उन्होंने वार्ड से भाजपा टिकट की दावेदारी की थी, लेकिन पार्टी ने सुन्दर सिंह टांक को उम्मीदवार बनाया। इसके बाद सीमा गोस्वामी निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गईं।

उनकी चुनौती का सबसे महत्वपूर्ण पहलू व्यक्तिगत संपर्क माना जा रहा है। खासकर महिला मतदाताओं के बीच उनका संपर्क और चुनाव चिन्ह ‘चूड़ियां’ भी उनके प्रचार अभियान को अलग पहचान दे रहा है। यदि भाजपा से नाराज लेकिन भाजपा विचारधारा से जुड़े मतदाताओं का एक हिस्सा सीमा के साथ जाता है तो इसका सीधा असर भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी के वोट पर पड़ सकता है।

बीना टांक के पास है पिछली जीत का अनुभव

कांग्रेस के लिए वार्ड 52 में सबसे बड़ी चिंता बीना टांक हैं। उन्हें केवल कांग्रेस की बागी उम्मीदवार मानना आसान नहीं होगा, क्योंकि वे इससे पहले भी निर्दलीय चुनाव जीत चुकी हैं। यही पुराना चुनावी अनुभव और व्यक्तिगत संपर्क इस चुनाव में उनका बड़ा आधार बन सकता है।

बीना टांक का दावा केवल कांग्रेस के असंतुष्ट मतदाताओं तक सीमित नहीं माना जा रहा। वे उन मतदाताओं को भी अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही हैं, जो पार्टी के बजाय स्थानीय उम्मीदवार और व्यक्तिगत संबंधों को प्राथमिकता देते हैं।

स्थानीय राजनीतिक चर्चा में कांग्रेस के प्रत्याशी चयन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। वार्ड सामान्य श्रेणी का होने के बावजूद सतीश बैरवा को टिकट दिए जाने को लेकर कुछ वर्गों में असंतोष होने की बात कही जा रही है। हालांकि इस तरह के दावों की वास्तविक तस्वीर मतदान के बाद ही सामने आएगी।

वहीं, माली समाज के मतों को अपने पक्ष में एकजुट रखने के प्रयास भी चुनावी समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए हैं। यदि समाज का वोट एक दिशा में मजबूती से जाता है तो मुकाबले में संबंधित उम्मीदवार को फायदा मिल सकता है। इसके अलावा बीना टांक द्वारा चुनाव चिन्ह सेव का आकर्षक तरीके से प्रचार ने चर्चा का विषय बना हुआ है।

भाजपा के सामने सुन्दर सिंह टांक की सीट बचाने की चुनौती

भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी सुन्दर सिंह टांक के पास पार्टी संगठन, चुनाव चिन्ह और भाजपा के परंपरागत मतदाताओं का आधार है। सामान्य परिस्थितियों में यह उनके लिए मजबूत पक्ष माना जा सकता है। लेकिन वार्ड 52 में पार्टी की बागी सीमा गोस्वामी की मौजूदगी इस समीकरण को कमजोर कर सकती है। खासतौर पर यदि भाजपा का असंतुष्ट वोट बड़ी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशी की ओर जाता है तो सुन्दर सिंह टांक के लिए मुकाबला कठिन हो सकता है।

कांग्रेस के लिए बीना टांक सबसे बड़ी चिंता

कांग्रेस प्रत्याशी सतीश बैरवा के सामने भी लगभग यही स्थिति है। पार्टी का पारंपरिक वोट उनके लिए आधार जरूर तैयार करता है, लेकिन कांग्रेस से बगावत कर चुनाव लड़ रही बीना टांक इस वोट बैंक में कितनी सेंध लगाती हैं, यही निर्णायक सवाल है। यदि बीना टांक कांग्रेस के परंपरागत मतदाताओं के साथ अपना व्यक्तिगत वोट बैंक जोड़ने में सफल रहती हैं तो कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी का चुनावी गणित प्रभावित हो सकता है।

5,692 मतदाता, पांच बूथ और जीत का बड़ा सवाल

वार्ड 52 में 5,692 मतदाता और पांच मतदान केंद्र हैं। यानी औसतन एक बूथ पर करीब 1,138 मतदाता आते हैं। ऐसे बहुकोणीय मुकाबले में किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में 35-40 प्रतिशत तक संगठित मतदान भी उसे मजबूत स्थिति में ला सकता है, लेकिन यह केवल गणितीय अनुमान है—वास्तविक जीत मतदान प्रतिशत और वोटों के विभाजन पर निर्भर करेगी। यही कारण है कि अंतिम समय में प्रत्याशियों का बूथ मैनेजमेंट, व्यक्तिगत संपर्क और समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने की क्षमता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

कौन किसका वोट काटेगा, इसी पर टिकी बाजी

वार्ड 52 में फिलहाल मुकाबले की सबसे बड़ी कहानी किसी एक पार्टी की सीधी बढ़त नहीं, बल्कि वोट कटने की संभावनाएं हैं।

सीमा गोस्वामी भाजपा के असंतुष्ट वोटों में सेंध लगाती हैं तो सुन्दर सिंह टांक को नुकसान।

बीना टांक कांग्रेस समर्थक वोटों को खींचती हैं तो सतीश बैरवा की स्थिति कमजोर।

यदि दोनों बागी प्रत्याशी अपने-अपने दलों के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाती हैं तो चुनाव पूरी तरह व्यक्तिगत वोट और बूथ प्रबंधन पर आ सकता है।

भाजपा का संगठन और कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक दोनों अधिकृत प्रत्याशियों के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम कर सकते हैं।

इसलिए वार्ड 52 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रह गया है। यहां असली मुकाबला पार्टी संगठन, बागियों की व्यक्तिगत पकड़ और अंतिम दिन के बूथ प्रबंधन के बीच दिखाई दे रहा है। कौन अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक बेहतर तरीके से पहुंचाता है और कौन पार्टी के असंतुष्ट वोटों को अपने पक्ष में मोड़ पाता है, इसका फैसला मतदान के दिन ही होगा।